बैंकिंग क्षेत्र में 'लंबी ठंड' से आएगी गर्मी (8/1/18)

भारत में बैंकिंग क्षेत्र की हालत काफी खस्ता है। अक्सर ऐसी मांगें उठती हैं कि इस समस्या को दूर करने के लिए तत्काल कुछ निर्णायक कदम उठाए जाएं। फिलहाल हमें कई दशकों की नीतिगत खामियों के परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। हालत ऐसी है कि सर्वश्रेष्ठ नीतिगत सुधारों से भी इस समस्या का समाधान धीरे-धीरे ही हो पाएगा। बेहतरीन हालत में भी बैंकों के ऋण-आवंटन के मामले में दीर्घ शीतकाल की स्थिति बनती दिख रही है। बाकी राजकोषीय एवं वित्तीय नीतियों का निर्धारण इसी को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। संयोग से भारतीय बैंकिंग प्रणाली का आकार छोटा है और अर्थव्यवस्था पर इसका असर भी कम है

बैंकिंग गतिविधि का मतलब है लोगों से उधार लेना और फिर उस पूंजी को कर्ज के तौर पर दूसरे लोगों को देना। बांटे गए कर्ज का कुछ हिस्सा डूबना तो लगभग अपरिहार्य है और इससे कर्ज वितरण की लागत भी बढ़ जाती है। बैंक प्रबंधक इस बुरी खबर को छिपाने की कोशिश करते हैं क्योंकि ऐसा करने से मुनाफे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने में मदद मिलती है और कर्ज वितरण संबंधी उनके फैसलों पर सवाल भी नहीं उठते हैं। प्रभावी बैंकिंग नियमन होने से डूबा कर्ज जल्द सामने आता है और बैंक भी इससे जुड़े नुकसान को खुलकर स्वीकार करते हैं।

भारत में बैंकिंग नियमन काफी हद तक डांवाडोल रहा है। नियामकों ने बुरी खबरें छिपाने में बैंक प्रबंधकों के साथ सांठगांठ कर रखी है। ऐसे माहौल में बैंकों ने व्यवस्थागत तरीके से ऋण मूल्यांकन को कम करके आंका है। उन्होंने कर्जों के लिए काफी कम शुल्क भी लिए हैं। अगर कारोबारी इकाइयों ने 100 रुपये का कर्ज लिया है तो मान लेते हैं कि उसमें से 10 रुपये का कर्ज फंसा और 5.5 रुपये की रिकवरी हुई। ऐसी स्थिति में 4.5 रुपये का जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई 90 रुपये के लाभपरक कर्ज से ही करनी होगी। इस सूरत में ब्याज पर पांच फीसदी प्रीमियम मिलना जरूरी होगा। भारत में बैंक इस सोच पर चलते रहे हैं कि उनका बुरे कर्ज से वास्ता ही नहीं पड़ेगा और इसीलिए वे कर्ज देते समय बहुत कम राशि वसूलते रहे हैं। नतीजतन अच्छे वक्त में भी बैंकों को इक्विटी पर खराब रिटर्न मिलता है और खराब दौर में उनकी पूंजी पर्याप्तता कम हो जाती है। इसकी मूल वजह दोषपूर्ण बैंकिंग नियमन हैं जो बैंकों में यह सोच पैदा करते हैं कि फंसे कर्जों को लंबे समय तक छिपाकर रखा जा सकता है।

दिवालिया कानून सुधार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि अब फंसे कर्जों को छिपाना काफी मुश्किल होगा। भारतीय ऋणशोधन एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) जब ऋण बाजार के लिए  समुचित पारदर्शिता बरतना अनिवार्य कर देगा तो चूककर्ताओं के नाम और वसूली की दरें भी हमारे मानक कॉर्पोरेट आंकड़ों का हिस्सा बन जाएंगे। इससे बैंकों के लिए यह दावा कर पाना मुश्किल हो जाएगा कि ये डूबे हुए कर्ज उनकी मानक परिसंपत्ति हैं। आरबीआई को संबंधित प्रावधान सख्त करने की जरूरत है। बड़ी उम्मीद है कि राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण में प्रक्रिया शुरू होने पर आरबीआई 50 फीसदी कर्ज की सीमा सुनिश्चित करेगा। आईबीबीआई और आरबीआई दोनों के अपना काम बखूबी करने पर ही बैंक इस पुरानी लेकिन बुरी आदत पर लगाम लगा पाने में सफल रहेंगे। भारतीय वित्त व्यवस्था के लिए यह एक ऐतिहासिक कदम होगा। भारत के इतिहास में पहली बार बैंकों पर कामकाज बेहतर तरीके से करने का दबाव पड़ेगा।

व्यक्तिगत दिवालिया होने की घटनाओं में भी ऐसी ही स्थिति दिख रही है। अतीत में हम कई बार कर्ज माफी की घटनाएं देख चुके हैं। इन योजनाओं में आम करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल फंसे कर्ज की समस्या से जूझ रहे बैंकों को राहत दिलाने के लिए किया गया। दिवालिया एवं ऋणशोधन संहिता (आईबीसी) का व्यक्तिगत दिवालिया प्रावधान वजूद में आते ही प्रासंगिक कर्ज माफी की जगह रोजमर्रा की शांत प्रक्रिया ले लेगी। आईबीसी की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में नई शुरुआत की व्यवस्था अपनाई जाएगी जिसमें गरीबों को दिए गए कर्ज माफ कर दिए जाएंगे। व्यक्तिगत ऋण के लिए बेहतर माहौल बनाने की दिशा में यह एक स्वस्थ कदम होगा। खास बात यह है कि इसमें बुरे कर्जों का बोझ आम करदाताओं के बजाय बैंकों पर डाला जाएगा। इससे बैंकों को भी यह सीख मिलेगी कि बेहतर बैंकिंग परिचालन कैसे किया जाए।

इसका मतलब है कि भारतीय बैंकिंग को कई अवरोध पार करने हैं। रिजर्व बैंक को भी अपनी प्रक्रियाएं सुधारने और बैंकिंग नियमन एवं पर्यवेक्षण के बेहतर तरीके अपनाने होंगे। बैंकों को भी बैंकिंग गतिविधियों के बारे में बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। पूंजी की भारी कमी को दूर करने के लिए धीरे-धीरे कदम उठाने होंगे। ये कोई छोटे कदम न होकर देश को लंबे समय तक प्रभावित करने वाली घटनाएं होंगी। हालांकि बैंकिंग संकट का तत्काल समाधान निकालने के लिए सार्वजनिक धन को 'बिग बज़ूका' के तौर पर इस्तेमाल करने की मांग तेज हो रही है। करदाताओं का पैसा कीमती है और हमें इसे बिखरने नहीं देना चाहिए। हमें अपनी चाहतों को लेकर अधिक नम्र होने की भी जरूरत है। हमारे सामने एक मुश्किल समस्या है और इसका कोई औचक समाधान नहीं हो सकता है। इस काम में पांच से लेकर दस साल तक का वक्त लग सकता है। इसमें लगने वाला समय इस बात पर निर्भर करेगा कि वित्त मंत्रालय इस काम के लिए कितने काबिल लोगों की टीम लगाता है?

इतिहास बताता है कि बैंकों की तरफ से निजी क्षेत्र को दिया जाने वाला कर्ज सालाना 10 फीसदी की दर से बढ़ा है। औसतन चार फीसदी की मुद्रास्फीति के हिसाब से वार्षिक ऋण वृद्धि करीब 14 फीसदी रही है। हमें बैंकिंग में एक लंबी ठंड के लिए अपनी तैयारी करनी चाहिए जिसमें इस तरह के आंकड़ों के लिए लंबे समय तक कोई गुंजाइश न हो। सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में बैंकिंग क्षेत्र में सिकुडऩ आनी चाहिए। एक विशाल बैंकिंग प्रणाली की विलासिता वही देश उठा सकते हैं जो बैंकिंग नियमन एवं पर्यवेक्षण के लिए सरकार को सक्षम बनाने की सामथ्र्य रखते हैं।

 

हालांकि इसका उजला पक्ष यह है कि भारत की वित्तीय व्यवस्था पर बाजार का दबदबा है जिसमें बैंकिंग की भूमिका काफी सीमित है। बैंकों की तरफ से सभी निजी लोगों को 79 लाख करोड़ रुपये के गैर-खाद्य ऋण दिए गए जबकि सीएमआईई कॉस्पी सूचकांक में शामिल कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 146 लाख करोड़ रुपये था। अगर विशाल बैंकिंग प्रणाली वाले चीन और जापान जैसे देशों के बैंकिंग संकट से तुलना करें तो भारत में हालात बेहतर हैं। हमें खुद को इस लंबी ठंड के लिए तैयार करना चाहिए और सार्वजनिक नीति संबंधी सर्वोत्कृष्ट कदमों की राह देखनी चाहिए। बैंकिंग क्षेत्र के शुरुआती अवरोध रिजर्व बैंक के सुधार पूरे होने पर ही असरदार हो पाएंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो नए बैंक भी पुराने बैंकों की ही तरह नाकाम होंगे और हमारे असफल बैंकिंग तंत्र का आकार और बड़ा हो जाएगा। हालात बेहतर करने वाले कई बिंदु गैर-बैंकिंग वित्त से जुड़े हैं। इक्विटी बाजार और बॉन्ड बाजार इस दिशा में आगे की राह दिखाते हैं। इसके लिए सेबी और शेयर एक्सचेंजों को सशक्त करने, इक्विटी बाजार को उदार बनाने और बॉन्ड बाजार के लिए जरूरी बुनियादी बदलाव लाने होंगे। वित्तीय तकनीक में क्रांति से छोटी कंपनियों और व्यक्तियों को कर्ज देना आसान हो जाएगा लेकिन इसके लिए वित्तीय नियमन प्रक्रिया में सुधार लाने होंगे और बॉन्ड बाजार से वित्त भी जुटाना होगा। पूंजीगत लेखा को उदार बनाने और घरेलू बीमा एवं पेंशन सुधारों से इक्विटी एवं बॉन्ड बाजारों में संसाधन बढ़ेंगे।

Monday, 08 January 2018 00:00 In Copy of Editorials & Articles Hindi

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